होम किसान जब खेती गांव में होती है तो कृषि दफ्तर बाजार में क्यों?

जब खेती गांव में होती है तो कृषि दफ्तर बाजार में क्यों?


परेशानी के चलते किसानों की आत्महत्या रुकती नहीं खबर ये अखबारों में छपती नहीं.


 सर्वविदित है कि जनसरकार हमेशा जनता के मुद्दों को मूर्त रूप दे रहा है, जो हमेशा जनहित की बात करता है। कृषक पुत्र और कृषि विज्ञान का छात्र होने के नाते जब किसानों की समस्याओं पर गहन अध्ययन कर रहा था तब पता चला  समस्या की जड़ तो एक छोटी सी गलती है। जो काफी सालों से ध्यान न देने के कारण आज विकराल रूप ले चुकी है।

मैं दावे के साथ कहता हूं कि आज के समय में 90% किसान अपने ग्राम सेवक का नाम तक नहीं जानते हैं और कई क्षेत्रों में ग्राम सेवक के पद आज भी रिक्त पड़े हैं।
हर साल सरकार कृषि की कई योजनाएं निकालती है उन योजनाओं में कृषि यंत्र पर सब्सिडी और कई कृषि यंत्र सरकार अनुदान पर किसानों को देती हैं इन सभी योजनाओं के बारे में किसानों को बताने का अधिकार ग्राम सेवक को है। 

पर दफ्तर मार्केट में होने के कारण सारी योजनाएं धरी की धरी रह जाती है जिनका बुरा असर सरकार पर पड़ता है और किसानों में एक वहम उत्पन्न हो जाता है।कि सरकार ने किसानों के हित के लिए कोई कार्य नहीं किया।


केवल एक नौकरी और सर्टिफिकेट के आधार पर कोई डॉक्टर इलाज नहीं कर सकता उसके लिए तो एक सटीक अनुभव की आवश्यकता होती है।
 तो दफ्तर में बैठे बैठे कैसे फसलों के नुकसान का अंदाजा कैसे लगाया जा सकता है।


 जनता का खास मुद्दा यह है कि जब खेती गांवों में होती है तो सरकारी अफसरों की ड्यूटी शहरों में क्यों ?

केवल शिक्षा के माध्यम से और सर्टिफिकेट प्राप्त कर लेने से अनुभवी नहीं बना जा सकता उसके लिए जमीनी स्तर पर उतर कर विभिन्न परिस्थितियों में एक-एक आंकड़ों का अवलोकन करना होता है।जब सरकार के पास सटीक कृषि आंकड़े नहीं जाएंगे तो सरकार कैसे सही नियम बनाएगी और सही नियम नहीं बनाने के कारण किसानों को समस्या का सामना करना पड़ता है।


 मैं यह नहीं कहता कि सरकार के पास गलत आंकड़े जाते हैं पर जो भी आंकड़े जाते हैं उनका सही से अवलोकन तो होना चाहिए।भारत एक कृषि प्रधान देश है आज के युग में  शिक्षित किसान आधुनिक खेती करता है साथ ही साथ नई- नई किस्मों की फसलों को उपजाता है।

पहले की तुलना में आज भारत में फसलों की कई नई क़िस्में विकसित की गई है ओर किसानों द्वारा भारी मात्रा में उन फसलो उगाया जा रहा है किसी समस्या का गहन अध्ययन करने पर पता चला कि ज्यादातर आंकड़े पुरानी फसलों के ही है,

जिन को ही आधार मानकर नए आंकड़े तय कर लिए गए हैं जबकि जमीनी हकीकत कुछ और है।
 जैसा की विदीत है आज के शिक्षित किसान नई फसलों की खेती कर रहे हैं तो उन फसलों की पैदावार, नुकसान, रकबा, खर्च, लागत, मूल्य आदि केवल अल्प मात्र अवलोकन करने से कैसे पता लगाया जाता सकता है।


इन सभी आंकड़ों को पता करने के लिए गांव-गांव जाकर और किसानों से चौपाल चर्चा करने पर कुछ हद तक पता लगाया जा सकता है। पर सिस्टम ही कुछ ऐसा बना है कि दफ्तर से ही अनुमान के आधार पर आंकड़े तैयार कर लिए जाते हैं जो कि अंततः किसानों के लिए कष्टप्रद होते हैं

इन समस्याओं को देखकर प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के नियमों में बदलाव कर त्रुटियो को सुधारा गया है  फसल में नुकसान का आंकड़ा तैयार करने के लिए नुकसान होने वाले खेतों से ही क्रॉप कटिंग किया जाए ऐसा नियम बनाया गया।

 सटीक आकड़ो के लिए 10 हजार क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट के सैम्पलों के आधार पर आंकड़े तैयार किए जाएंगे पर नियमों की धज्जियां उड़ा दी जाती है।ओर दफ्तर से ही प्रोसेस पूरी कर दी जाती हैं।


मेरा आरोप आंकड़े तैयार करने वाले अफसरों पर नहीं है पर शासन-प्रशासन अगर इन छोटी-छोटी गलतियों को  नियम बनाकर सुधार दे तो किसानों की समस्याओं का हल जरूर होगा

कई बार अधिक नुकसान से त्रस्त इलाकों में फसल बीमा दो-तीन साल तक नहीं आता है और कई क्षेत्रों में बीमा तुरंत आ जाता है।जबकि वहां पर नुकसान केवल 10% तक ही होता है। मेरा यह लेख किसी सरकार या सरकारी अफसर के खिलाफ नहीं है।मेरा मकसद तो हकीकत से परे जो सत्य है उसको जनता व सरकार के सामने लाने का है। 

मेरा शासन प्रशासन से निवेदन है कि समस्याओं का हल ढूंढा जाए जिससे किसानों को परेशानी ना हो और यह सब सरकारी अफसरों के बलबूते पर ही संभव है।

अगर आपके पास भी जनता की परेशानी से संबंधित कोई मुद्दा हो तो कृपया हमें बताएं जनसरकार हमेशा जनता के लिए समर्पित है। हम आवाज जोरो उठाएंगे।

milindrahttps://jansarkarnews.com
योगाचार्य पं.मिलिन्द्र त्रिपाठी उज्जैन मध्यप्रदेश शिक्षा -: एमएससी योग थैरेपी, पीजी डिप्लोमा योग दर्शन ,एम. ए पत्रकारिता , एल.एल.बी ,एम एस डब्लू ,बी.सी.ए पद – सचिव उज्जैन योग संघ संस्थापक उज्जैन योगा इंस्टीट्यूट संपर्क 9977383800 ,9098369093

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