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मक्कार सरकारी कर्मचारियों की सेवा समाप्त करके निजीकरण करना देशहित में होगा

लेखक अक्षय भाटी बड़नगर

वर्तमान में निजीकरण अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अर्थव्यवस्था का एक अभिन्न अंग बन चुका है। सरकारी कमर्चारियों की मक्कारी से आप सभी परिचित है । बिना टारगेट के केवल सैलरी पर फोकस होकर काम करने के साथ साथ भष्ट्राचार करना भी सरकारी कर्मचारियों की आदत में शुमार है । कुछ वर्षों पूर्व तक जो देश पूर्ण राजकीय स्वामित्व वाली केन्द्र नियोजित अर्थव्यवस्था चला रहे थे । उन देशों में भी निजीकरण की प्रक्रिया जोर पकड़ने लगी है, क्योंकि राजकीय स्वामित्व और केन्द्र नियोजित अर्थव्यवस्था असफल साबित हुई और उन देशों की आर्थिक बदहाली के कारण के रूप में इन्हें देखा जाता है।

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सरकारी स्वामित्व और नियंत्रण वाले व्यवसाय और उद्योग के सम्बन्ध में भारत जैसे मिश्रित अर्थव्यवस्था वाले देश का अनुभव भी बेहद बुरा है । देश की जनता से कुछ छुपा नही है सरकारी नौकरी करने वालो की वजह से अनेको सरकारी योजनाएं फेल हो चुकी है । देश की आज़ादी के बाद से अब तक , हमारी सरकारों ने गरीबी, अशिक्षा और बेरोज़गारी को रोकने के लिए तमाम तरह के उपाय किए लेकिन उनके सभी प्रयासों में कितनी सफलता मिली, ये बात सिर्फ कागज के आंकड़ो में ही अच्छी लगती है।
सरकारी क्षेत्र की दूरभाष और विमानन कम्पनियों की दुर्गति और स्तरहीन सेवाओं के बारे में आप सभी को अच्छे से पता हैै।

आज ये सफ़ेद हाथी से अधिक कुछ नहीं जिस पर आम जनता की मेहनत की कमाई से जुटाए टेक्स को बर्बाद किया जाता है। विमानन कंपनी एयर इंडिया पर हर साल करोड़ों रुपए की बर्बादी होती है, उसका घाटा पूरा करने के लिए कभी सब्सिडी तो कभी छूट दी जाती है, फिर भी इसका घाटा आसमान छूता रहता है और जब से इसकी प्रतियोगिता में बाजार में निजी विमानन कंपनियां आई हैं वो बहुत कम दाम पर भी बेहतर सेवा देने लगी तब तो स्वत: ही इन सरकारी कम्पनियों को बंद करने के अलावा सरकार के पास कोई रास्ता नही बचा है ।
आज, सरकारी स्कूलों में वो सब सुविधाएं हैं जो शिक्षा के अधिकार कानून के तहत तय हुए हैं, बिल्डिंग हैं, स्पोर्ट्स ग्राउंड, लाइब्रेरी, कहीं-कहीं तो स्वीमिंग पूल भी है, नहीं है तो सिर्फ योग्य शिक्षक । सरकारी टीचर लाखो रुपये वेतन के रूप में लेते है लेकिन काम के नाम पर केवल वाट्सएप चलाकर टाइम पास करते है । बड़े प्राइवेट स्कूलों में भी ये सभी सुविधाएं हैं साथ ही पढ़ाई भी अच्छी है सिर्फ महंगी है तो केवल फीस। ऐसे कितने सरकारी स्कूल हैं जिनसे अभिभावक संतुष्ट हो शायद गिनेचुने ? तो क्यो इनका निजीकरण नही किया जाए ?
देश से सेना और पुलिस को छोड़कर सरकारी विभाग खत्म होना चाहिए और बाकी अन्य विभागों का निजीकरण होना चाहिए तभी देश सही दिशा में आगे बढ़ पायेगा , क्योंकि 70%कर्मचारि वामपंथी विचारधारा के है जिन्हें देश और जनता से कोई लेना देना नही है ।

उनका मकसद सिर्फ और सिर्फ टाइम पास करना है और अपनी तिजोरी भरना है क्योंकि इन लोगो मे भावनाओं की कमी होती है । ये लोग प्रतियोगिता परीक्षा उतीर्ण कर अपना स्थान बनाते है तो इनमे अहंकार का समावेश हो जाता है भारत विश्व गुरु बने और जनता का कल्याण हो यह भावना इन लोगों में मर चुकी होती है 70%कर्मचारियों का मेने आकलन किया है । इनमे आम नागरिकों से बात करने तक का लहजा नही है , चुकि सरकार के दबाव से यह लोग आम नागरिको से संवाद बनाते है वो भी कागजी तोर पर सीमित रह जाता है । कई लोग रिश्वत देकर शासकीय नोकरी पा लेते है , जिससे काबिल लोग रह जाते है

और उनका आत्मविश्वास खत्म हो जाता है और वे लोग डिप्रेशन का शिकार होकर आत्महत्या या अन्य कोई कदम तक उठा लेते है ।सरकार की तिजोरी इनकी मोटी तनख्वाह में खाली हो जाती है और ये लोग देश को कंगाल बना देते है । ओर सरकार जब ईमानदारी से इन कर्मचारियों या अधिकारियों पर कार्यवाही करती है तो ये लोग कर्मचारी संगठन बना कर के दबाव बनाते है फिर अंततः सरकार को झुकना पड़ता है । मेरा प्रधानमंत्री जी और देश के संसद में बैठे सभी सांसदो से अनुरोध है

कि देश मे रोजगार की एक ऐसी नीति तैयार करे जिससे देश के सभी बेरोजगारो को रोजगार का अवसर मिले , उसके लिये मेरी दृष्टि में निजीकरण बहुत फायदेमंद साबित होगा और देश मे समान भाव पैदा होगा ,निजीकरण से रोजगार की सम्भावनाऐ 100% बढ़ेगी और देश आत्मनिर्भर ओर सम्रद्ध बनेगा ,तभी भारत मे डिजिटल इंडिया का जो ये नारा है यह सार्थक होगा ओर भष्ट्र आचरण देश से समाप्त हो पायेगा अन्यथा ये सिस्टम में बेठे शासकीय अधिकारी कर्मचारी कभी नही चाहेगे की देश आगे बढे, ओर इन लोगो की मानसिकता ये होती है की नेता हमारा कुछ नही बिगाड़ सकता , बात तो सही है बिगाड़ना भी नही चाहिए, पर इनके अहंकार को किसी अन्य तरीके से समाप्त तो किया जा सकता है , इसलिए देश मे निजीकरण बहुत जरूरी है ।

ताकि बेरोजगारो को उनकी योग्यता और क्षमता के अनुसार रोजगार मिल सके । 21वीं सदी की शुरुआत में देखिए जहां-जहां निजी क्षेत्र ने कदम बढ़ाए हैं लोगों की परेशानियां कम हुई हैं उनकी ज़िंदगी पहले से बेहतर हुई हैं, सेवाएं उनको घर बैठे मिल रही हैं और वो पूरी तरह संतुष्‍ट हैं जैसे बीमा, निर्माण क्षेत्र, आवास, बैंक, दूरसंचार, मनोरंजन कहीं भी नज़र दौड़ा लीजिए लेकिन अभी इस दायरे को और अधिक बढ़ाने की जरूरत है, सरकारी नौकरी में एक व्यक्ति की लाखों रुपये प्रतिमाह सैलरी होती है जो उसे बिना टारगेट पूरा करें मिलती है इस लिए बाकी के बचे क्षेत्रों में निजी क्षेत्र की अपार संभावनाओं को तलाशने की जरूरत है। 

(यह विचार लेखक के निजी विचार है । )

       लेखक -: अक्षय भाटी बड़नगर
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योगाचार्य पं.मिलिन्द्र त्रिपाठी उज्जैन मध्यप्रदेश शिक्षा -: एमएससी योग थैरेपी, पीजी डिप्लोमा योग दर्शन ,एम. ए पत्रकारिता , एल.एल.बी ,एम एस डब्लू ,बी.सी.ए पद – सचिव उज्जैन योग संघ संस्थापक उज्जैन योगा इंस्टीट्यूट संपर्क 9977383800 ,9098369093

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